१९५८ की बात है | कुछ वर्षों से मैं गुरुवर्य मास्टर कृष्णराव से संगीत की नियमित रूप से शिक्षा ले रहा था | तब मैं इंटर में पढ़ रहा था और युनिव्हर्सिटी की परीक्षाएं सिर पर थी | प्रायः ऐसा होता था कि एकाध बार भी तालीम में नागा हो, तो मास्टरजी से अच्छीखासी डाँट पड़ती, लेकिन चूँकि इस बार इम्तिहान नजदीक थे, लिहाजा उनसे एक माह की छुट्टी की मोहलत मिल गई | यद्यपि पढ़ाई करते समय मेरे भीतर कुछ खोने या छूट जाने जैसा भाव बराबर जगा रहता | ऐसे में खबर आई कि डॉ. पाबलकर जी की कन्या के विवाह के उपलक्ष्य में जयंत मंगल भवन में गुरूजी की संगीत महफ़िल होने जा रही है | सुनते ही मन में हूक-सी जगी कि जाना होगा | इस बहाने पढ़ाई की थकावट भी दूर हो जाएगी और नए उत्साह से दुबारा पढ़ाई कर लूँगा ऐसा खुद को ही समझाते हुए कोई ख्याल ही सुनकर आ जाऊंगा यह सोचकर मैंने जाने का मन बना लिया |
मंगल भवन में जैसे ही मुझ पर नजर पड़ी, गुरूजी ने तुरंत टोक दिया | मैंने यह कहकर कि कुछ ही देर में चला जाऊँगा, उनको मना लिया | डॉ. पाबलकर मास्टरजी के निकटतम भक्त थे, लिहाजा तय था कि यह महफ़िल घरेलू माहौल में बड़ा रंग भरनेवाली साबित होगी | मास्टरजी वैसे भी साक्षात् महफ़िलों के बादशाह ! स्वरों को लगाकर बंदिश की शुरुआत करते ही उनके और श्रोता के बीच का अंतर गायब हो जाता था | फिर यह तो घर की ही एक अनौपचारिक बैठक थी | शुरुआत ही दरबारी कान्हड़ा के ‘जैसे मोरा जी’इस झुमरे के ख्याल से हुई |
हमेशा की अपेक्षा कुछ कम समय लेते हुए वे पूर्वांग में राग विस्तार करते हुए तार षड्ज में ‘पाछली प्रीत’ इस अन्तरे तक पहुंचे | उसके पश्चात् मध्य सप्तक के पंचम से तार सप्तक के गंधार मध्यम तक स्वरों की सहायता से उन्होंने दरबारी को जिस तरह से प्रस्तुत किया, वह केवल बेजोड़ व अनुपम था |अब तक पुत्र के समान पली-बढ़ी कन्या के एक अच्छे घर में ब्याहे जाने की सुखद भावना के साथ-साथ ‘अयो हि कन्या परकीय एव’ ( यह कन्या पराई ) के गान के साथ उसे बिदा करने की अकुलाहट, इन दो भावों का विलक्षण सम्मिश्रण मास्टरजी के सुरों की एक-एक उपज से उभर रहा था | ख्याल गायकी ख़त्म करते हुए वे त्रिताल की जलद चीज की तरफ मुड़ गए |
‘सबक मिलके बंधनवाँ बांधो रे | महम्मदशोँ प्यारी के घर काज है | सदा रंगीली तानन सो बंधवा गाओ रे माई | सब सखियन को काज है |’
इस चीज के शब्द, अर्थ व भाव जितने प्रसंगानुकूल थे, स्वरों के माध्यम से निर्मित शब्द-चित्र उससे भी अधिक अद्वितीय था | इस मंत्रमुग्ध वातावरण में एक घंटे तक चला दरबारी कान्हड़ा जब खत्म हुआ, तब किसी अद्भुत स्वर समाधि से जागृत होने की अनुभूति से सभी भाव विभोर हो गए थे |
श्रोताओं के मन पर पड़े इस संवेदी तनाव को मास्टरजी जैसे समझ चुके थे | उन्होंने ‘ऐसी ना मारो पिचकारी’ इस मिश्र खमाज मांड की ठुमरी की शुरुआत की और सभी के मन पर का बोझ हटने लगा | इसके पश्चात् उन्होंने संगीत सौभद्र’ नाटक के ‘सखे किती सांगू तुला’ ( सखी, क्या कहूँ तुझे ) इस सुभद्रा की आकुल भावावस्था को प्रकट करनेवाले नाट्य पद को इतनी तन्मयता से पेश किया कि श्रोता आनंद के सागर में गोते लगाते चले गए | मध्यांतर हुआ | ‘एक ही ख्याल को सुनकर चला जाऊँगा’,गुरूजी को दिए हुए इस वचन का भंग हो चुका था, जिसे हम दोनों भी ताड़ गए थे | मास्टरजी ने तुरंत घर जाकर पढ़ाई करने का आदेश दिया | मेरे पास कोई चारा नहीं बचा, सो वहां से चल पड़ा | लेकिन मंडप के बाहर निकलते ही कदम जैसे वहीं पर जम-से गए | पढ़ाई का दबाव था, इसलिए जाना भी जरुरी था | फिर भी मध्यांतर के बाद की शुरुआत किस राग से होती है, केवल इसे जानकर चला जाऊँगा, इस बहाने ने दुबारा मुझे रोक लिया |
मास्टरजी ने अपनी खास शैली में तार षड्ज लगाकर ‘जोवन मद भर आई’ इस सोहनी राग की बंदिश की शुरुआत की | दस एक मिनट तक उसका अंदाजा लेकर मैं भारी क़दमों से घर की दिशा में इस तरह से मुड़ा, मानों कोई कैदी फांसी पर लटकने जा रहा हो | जयंत मंगल कार्यालय से मेरे घर की तरफ जानेवाला रास्ता स्काउट ग्राउंड, जिसके सामने वर्तमान का उद्यान मंगल कार्यालय है, से होता हुआ भिकारदास मारुती मंदिर से निकलकर नातू बाग़ की तरफ जाता था | सोहनी के मीठे सुर और मास्टरजी के गले से राग का प्रकट होता विलक्षण आविष्कार अब अस्पष्ट हो चला था |
मैं क़दमों को घसीट रहा था | मंगल भवन के सामने एक रेखा इस तरह से आई कि उससे बाहर कदम रखो तो गीत के स्वर सुनाई न दे और एक कदम भीतर आओ तो भले ही अस्पष्ट सुनाई दे, गीत कानों से टकराकर मन को स्पर्श कर उठे | मुझे याद तो नहीं, लेकिन कम-स-कम दस से पंद्रह मिनटों तक मैं उधेड़बुन में घिरा एक कदम आगे व एक कदम पीछे करता हुआ वहीं पर खड़ा था | मन प्रचंड द्विधावस्था से डाँवाडोल हो रहा था | जैसे मेरे सांगीतिक और शैक्षिक करिअर के बीच झगड़ा चल रहा था | अंततः मन की यह उन्मनी अवस्था इस चरम तक जा पहुँची कि मन ने कहा, अभी निर्णय लो | वे धुँधले-से सुनाई देते स्वर, जो मेरे अंतर्मन को स्पष्टता से सुनाई दे रहे थे, उनका मोह मुझ पर भारी पड़ने लगा था |
इंटर की परीक्षा दुबारा दे सकते हैं, लेकिन यह अलौकिक स्वर्गीय गान दुबारा सुनने मिले या न मिले | ऐसा अवसर कभी नहीं मिलेगा इस तर्क तक मेरा अंतर्मन पहुंच गया और मानों उसके आदेश का शीघ्र पालन करना होगा, इस तरह से मैं क़दमों को तेजी से बढ़ाता हुआ, लगभग भागा-भागा मंगल भवन की दिशा में दौड़ पड़ा | उसके पश्चात् ‘वद जाऊ कुणाला शरण’, ‘परब्रह्म निष्काम तो है’ ये पद और उस रंग व रौनक बिखेरनेवाली शानदार महफ़िल का उत्कर्ष बिंदु साबित होती उनकी ‘चुरिया करके गैया’ इस भैरवी को मैंने मंडप के बाहर बैठकर चोरी-चोरी सुना | जब वह खत्म हुई तब सुबह के साढ़े पाँच बज चुके थे | मन की लाख तैयारी के बावजूद इंटर की परीक्षा दुबारा देने का योग मेरे नसीब में फिर नहीं आया | लेकिन कृष्ण की बंसी के स्वर्गीय स्वरों की तरफ गोप-गोपी-ग्वालनें ही नहीं, अपितु मवेशी भी किस तरह से मुग्ध होकर खिंचे चले आते होंगे, इसकी पूरी अनुभूति अवश्य उस रात मुझे हो चुकी थी |
संदर्भ: साधना